Thursday, January 19, 2017

नीक-जबून- 4

(डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी)

रसियाव खाईं आ टन-टन काम करत रहीं
      आजु स्टाफ रूम में अपना गीत के एगो लाइन गुनगुनात रहीं-
“ननदी का बोलिया में बने रसियाव रे।
सरगो से नीमन बाटे सइँया के गाँव रे।“
साहा सर के जिग्यासा पर चर्चा शुरू हो गइल कि “रसियाव का हटे।” खीर के पुरान रूप कहिके ओकराके गइल-बीतल बतावल जात रहे। हमरा ई जमल ना। पहिले के बात आ परंपरा सभ आउटडेटेड कइसे हो जाई भाई ? चाउर में गुर डालिके सिंझावल जात रहे, ओमें दूध ना डलाइ। एकरे के रसियाव कहल जात रहे। सभसे बड़ आपत्तिजनक बात रहे ओह घरी दूध का अभाव के। अब ई कइसे मानि लिहल जाव ? आजु भलहीं गाँवो में दूध मिलल कठिन हो गइल बा, बाकिर पहिले त स्थिति उल्टा रहे। पहिले दूध-दही के कहाँ कमी रहे ? हम आपन पक्ष रखलीं आ कहलीं कि छठि में त खीर ना रसियावे के महातम हटे। अब त मिसिर जी बमकि गइले। ई कइसे रउँआ कहि सकींले ? गोस्वामीजी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में रमल रहन। बन्न कइके ऊहो रस लेबे लगलन। हम कहलीं कि भाईजी हमार बचपन गाँवे में गुजरल बा। खरना में हम कबो खीर नइखीं देखले। हमनी किहाँ त रसियावे बनत रहे। जब बाहर–भीतर निकले-पइसे लगलीं त खिरियो (खीर भी) मिले लागल। हमरा त बुझाता कि लोग देखादेखी आ लोकापवाद से बाँचे खातिर खीर चला दिहले नाहीं त परंपरा रसियावे के बा।
      हमरा यादि बा, खरना में पहिल बार खीर खइले रहीं बोकारो थर्मल में त्रिपाठी जी किहाँ, बाकिर अलगा से प्लेट में परसाद कहिके जवन दिहल गइल रहे ऊ रसियाव रहे। ऊ परिवार आधुनिक रहे बाकिर परंपरा के भरपूर सम्मानो रहे ओहिजा। आँखि मूदिके कुछऊ सँकारे भा टरकावेवाला काम ओहिजा ना होत रहे। बड़ से बड़ आ छोट से छोटो बात पर जमिके बहस होई, सूक्ष्म बहस होई। हम कहलीं कि अभाव के बात त भुलाइए जाईं सभे। एकरा पीछे बिग्यान बा। दूध खाइ-पीके आराम करेके हटे। एहीसे दूध पीके जतरा ना कइल जाला। चिकित्सा बिग्यान का अनुसार बच्चन खातिर त ई ठीक हटे बाकिर बड़ लोग के सुपाच्य ना होखे। हमनी किहाँ बरती खा-पीके आराम ना करेलिन, आपन मए कामो निपटावत रहेलिन। ओइसहूँ बइठियो के रहेके होखे तबो दूधवाली खीर नुकसाने पहुँचाई, भलहीं बुझाउ भा नाहीं। रसियाव खाईं आ टन-टन काम करत रहीं, देंहि हलुक लागेले। लउकियो-भात का पाछा ईहे बिग्यान बा। गैस आ एसिडिटी खातिर लउकी रामबाण हटे। भात से गैस बनी आ लउकी ओकराके फरकावत रही आउर ऊर्जो बनल रही। धन्य रहन हमार पूर्वज, बात-बात में बिग्यान। हम त आजुओ कहबि कि लजाईं सभे मति कि रसियाव देखिके लोग रउँआ के गरीब आ पुरान बूझे लगिहें। लउकी-भात आ रसियाव के परंपरा के जिंदा रहे दिहल जाव। एही प लउकजाबरि, अलुमकुनी, गादा के दालि, महुआ के लाटा, बजड़ा आ जोन्हरी के चिउरी, साँवा के भाका, टाङुनि के लाई आ दरिया-दही पर बात चले लागल आउर हमार कुछ बंगाली मित्र कबो अचरज से आ कबो भकुआ के हमनीके देखे लगलन।
भोजपुरी के पहिचान
      बाते बात में हमरा मुह से फेड़ निकलि गइल। सेन सर हँसले- ई फेड़ का हटे ? हम कहलीं कि हिंदी में पेड़ आ भोजपुरी में फेड़। भोजपुरी महाप्राण भाषा हटे। फेड़ माने झङाठ पेड़, बाकी सभ गाँछ-बिरिछ। ऊ चकइले आ कहले कि एहीसे नु भोजपुरिया लोग बरियार होलन। जब हम कहलीं कि भोजपुरी में हाथी स्त्रीलिंग हटे आ ओकर पुलिंग रूप हाथा त खूब जोर के हँसी भइल। हम कहलीं कि अतने ना हथंगो (हथंग भी) बाटे। अब कइसे बताईं कि भलहीं हमनी खातिर हिंदी लिखल-बोलल अब आसान हो गइल बा बाकिर भोजपुरी में सभ कुछ हिंदिए नियन ना होखे। हिंदी में दही शब्द भलहीं पुलिंग होखे बाकिर भोजपुरी में स्त्रीलिंग बाटे, ई अलग बात बा कि दही पीयल ना जाय, सरपोटल जाले। एह तरह के अंतरे त भोजपुरी के पहिचान बा। आज-काल्हु लोगन का लागे लागल बा कि पहिले के लोग अनपढ़ रहन एहसे कहत रहन कि “आटा पिसावे जातनी, सातू पिसावे जातनी।” एहीसे अब तथाकथित नया पीढ़ी अब गेहूँ आ बूँट पिसावे लागल बिया।
सूतल सनेह आके के दो जगा गइल
                16 दिसंबर, 2016. काल्हुए व्हाट्सप पर एगो दुखद खबर मिलल रहे। आजु खोललीं त मन बइठि गइल। भोरहीं से आँखि पर कंट्रोल नइखे। ड्यूटी पर निकले के बा आ लेट हो रहल बा। कृपाशंकर उपाध्याय जी का चलि गइला से अइसन लागता जइसे भोजपुरी के एगो अध्याय बीत गइल। उहाँका लेखक ना रहीं, गायको ना आ नु रंगकर्मी बाकिर एह तीनों के उहाँसे जबर्दश्त ऑक्सीजन मिलत रहे, उहाँके जीवंत आ समरस क्रियाकलाप से पूरा समाज के ऊर्जा मिलत रहे। बलिया के बसुदेवा गाँव के रहीं आ पटना टेलिफोन भवन में काम करत रहीं। ससम्मान रिटायर हो गइल रहीं बाकिर हमरा से जब्बे मिलीं, कबो लगबे ना कइल कि रिटायर भइल बानी। ऊहे जज्बा, ऊहे जिंदादिली आ ऊहे दरियादिली। बरिसन बाद एह साल जून में कुछ दिन साथ रहेके मोका मिलल। मने ना होखे अलग होखेके। फगुआके पहरा के दुसरका संस्करण में ऊहोंका आपन टिप्पणी दिहलीं, बहुत खुश होके। आजु जब उहाँके किताब भेंट कइके हमरा लागित जइसे हम जग जीत गइलीं, “बीत गइलीं” के खबर पर मन घुरियाइल बा। बिशवास नइखे होत आ करेजो डहकता। उहाँका गइला से हम अपना ताकत के एगो बड़हन हिस्सा खो देले बानी। संसृति के दोसरका अंक के प्रकाशन से लेके लोकसंगीत के हमरा हर कार्यक्रम में उहाँके उपस्थिति कवनो ना कवनो रूप में जरूर रहल बिया। कॉलोनी के केहूके पीएमसीएच ले जा रहल बा लोग त अधरतियो खा काँचे नीनि से जगाके हमरा के उहाँका शामिल जरूर करत रहीं। व्यावहारिकता में अपने त अव्वल रहबे करीं, हमरो में ई गुन भरे से कबो चुकलीं ना। भोजपुर कॉलोनी के उहाँका जान रहीं, शान रहीं। आजु ओह नेह के दरियाव के इयाद से मन-प्राण भींज गइल बा। हमार एगो गजल उहाँके बहुत प्रिय रहे। आजु ओकर एगो शेर मन का जुबान पर त जइसे चिपकिए गइल बा -
“सूतल सनेह आके के दो जगा गइल।
जिनिगी में दरद के बा लहबर लगा गइल।”
उहाँके बार-बार परनाम करत हम सरधांजली दे रहल बानी।


नीक-जबून- 3

(डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी)

चले दीं, प्रयोग बहे दीं धार
                काल्हु ये दिल माँगे मोर” पर बहस होत रहे। हम कहलीं कि भाई मोर का जगहा और कहलो पर त कुछ बिगड़ी ना। फेर काहें एकर ओकालत करतारे लोग। हर भाषा में लिखे-पढ़ेवाला लोग विदेशी शब्दन का मोड़ पर कुछ देर रुकिके सोचेले, काहेंकि धड़ल्ले से एकर प्रयोग कइला के मतलब बा व्यंग-बौछार के शुरुआत के नेवता। इहाँ का इंगलैंड में पैदा भइल रहीं....जी, एंग्लो इंडियन हईं.... इहाँ का लेखन पर उत्तर आधुनिकतावाद के असर बा....। एह तरह के जुमलन का अलावा कुछ ना मिली त एगो बिदेशी मीडिया के दिहल अपमानजनक शब्द हिंगलिश त जरूरे सुने के मिल जाई। हमरा सबसे खराब हिंगलिश लागेला, जवनाके चार भाग में एक भाग हिंदी(हिं) आ तीन भाग अंग्रेजी (ग्लिस) बा। कहनाम (ध्वनी) सीधा बा कि एह भाषा के आधारभूत संरचना माने रीढ़ के हड्डी अंग्रेजी बिया आउर बाकी सभ हिंदी। एह सोच के चलावेवाला आ सँकारेवाला- दूनो लोगन के बहादुरी आ स्वाभिमान के जतना बड़ाई कइल जाव, कमे कहाई। ए घटिया शब्द के वकालत करेवालन के ई काहें ना बुझाला कि खुद अंग्रेजिए में 20 प्रतिशत शब्द ओकर बा आ शेष 80 प्रतिशत विश्व के अउर भषन के। तब ओकरा के कहल जाई इंविश्व’? कवनो अइसन भाषा नइखे, जवना में बिदेशी शब्दन के प्रयोग सँकारल नइखे गइल। हमनी किहाँ लमटेन, रेल, अस्पताल, गिलास, बर्तन, कुर्सी, कफन, गबन, टेबुल, बेंच, पुलिस, मजिस्ट्रेट- ढेर अइसन शब्द बाड़े स, जवन भोजपुरी में प्रयुक्त होके भोजपुरिए बन गइले सन। जब उहनी के अपनावे में हमनीका तनिको ना सकुचइलीं जा त, आजो कुछ नया शब्दन के अपनावे से परहेज ना करेके चाहीं। हँ, एहमें सावधानी जरूरी बा। ओही नया शब्दन के अपनावल जाव, जेकर हमनी किहाँ विकल्प नइखे। अब रात खातिर नाइट लिखल-बोलल जाई त कहीं से न्यायसंगत ना कहाई। ई हास्यास्पद होई आ खतरनाको। हम त कहबि कि अनुवाद से भरसक बचे के कोशिश कइल जाव। जरूरी विदेशी शब्द कुछ दिन में अपने आप भोजपुरी बन जइहें सन। कुछ त बेंच से बेंच आ पुलिस से पुलिसे रह जइहें सन आ कुछ ग्लास आ लैटर्न शब्द से गिलास आ ललटेन (लमटेन) हो जइहें सन। एह स्वीकार से हमनी के भोजपुरी भाषा के स्वरूप में व्यापकता आ अंतर्राष्ट्रीयता के भी समावेश हो जाई। एहसे हम त ईहे कहबि कि बिदेशी शब्द अपनाईं बाकिर सम्हरि के।
                एगो अउरी बात। भाषा के प्रयोग पर बतोबरन के खूब असर होला। एहसे जो अंग्रेजी शब्दन के कुछ जदो (ज्यादा भी) प्रयोग मिल जाए आ ऊ स्वाभाविक लागे त नाक-भौं मत सिकोरीं सभे। ई समय के माङ बा, दकियानूसी से काम ना चली। समय ओह प्रयोगन के खुदे चलाई भा उड़ा दी। अभी जरूरत बा जादा से जादा आ गुणवत्ता से भरल लिखल-बोलल। चलें दी प्रयोग बहे दीं धार।
अनुवाद उहे, जे रच बस जाए
                एक महीना पहिले एक आदमी एगो प्रश्न पूछि के हमरा के अजीब पेशोपेश में डाल देले रहे। जइसे थैंक्यू का प्रतिउत्तर में युअर वेलकम जइसन कुछ ना कुछ कहल जाला, ओइसहीं धन्यवाद का प्रतिउत्तर में का कहल जाई ? त हमार एगो मित्र चट दे कहि दिहले- “राउर स्वागत बा, कहीं आ घर के पता दे दिहीं।” एह चट दे पर हँसी त खूब भइल बाकिर विषय के गंभीरता में कवनो कमी ना आइल। संतोषजनक जबाब ना मिलल।
                हम कबो-कबो सोचींले कि हर विदेशी शब्द के अनुवाद खातिर लबलबाइल ठीक ना होखे। जवन शब्द कवनो खास संस्कृति के अंग बाड़े सन, उहनी के अनुवाद से हमनी के बचेके चाहीं। थैक्यू, सॉरी, गुड मार्निंग आदि शब्द अपने आप में संस्कृति के अविभाज्य बिंब बाड़े सन आ इहनी के अनुवाद जादा दिन ना चल पाई। हमनी किहाँ जब केहू उपकार करेला त थैंक्यू से काम ना चले। जीवन भर कृतज्ञ होके रहेके परेला। प्रति उपकार करउँ का तोरा,कपि से उरिन हम नाहीं- ईहे हमनी के संस्कृति ह। थैंक्यू कहिके भा कुछ पइसा देके चल दिहला से उपकार के भार ना उतरी एहिजा। एहसे अनुवाद कइके पूरा संस्कृति समेटला से नीमन होई कि जहाँ औपचारिकता के जरूरत बा, सीधे थैंक्यू बोल दीं आ ओकरा बाद लौटावेवाला नेवतो-पेहान ले लीं।
                गुड मॉर्निंग। एकर माने होला (राउर सुबह शुभ होखे, नीके बीते)। ई त हमनी किहाँ असिरबाद हो गइल। हमनी किहाँ बड़ असिरबाद देले आ छोट प्रणाम करेले। तीसर त कुछ ना होखे आ पछिम में दूनो में केहूँ भा दूनो गुड मॉर्निंग कर सकता। आउर त आउर टाइम देख के अभिवादन करीं। 12 बजे रात के बाद जब फोन आवे त अन्हुवाते सुप्रभात कहीं। अपनहूँ जम्हाई लीं आ अगिलो के सरग के सुख दिहीं। ढेर लोग बोली- रतिए खा ? हमार कहनाम बा कि अंतर्राष्ट्रीय दिन शुरू हो गइल नु जी त अपना अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व के अब खिले दीं। रेडियो का किरिपा से सुप्रभात त आजकल केहू समझ लेता बाकिर गुड आफ्टरनून, गुड इवनिंग, गुड डे आ गुड नाइट के अनुवाद कतना लोग जानतारे ? आ एह अनुवाद से कवन खजाना मिल जाई भा गंगानहान हो जाई ? सॉरी आदि शब्द भी एही तरह के बाड़े सन। हम त ईहे कहबि कि ई शब्द अपने आप में एगो खास संस्कृति के प्रतिनिधित्व करतारे सन। व्यवहार में जरूरी लागे त सीधे प्रयोग में कवनो संकोच ना होखेके चाहीं काहेंकि अनुवाद में कठिनाई बहुत बा। तबहुँओ जो बेहतर अनुवाद मिले त अपना भाषा के कोष बढ़ावे से परहेज ना होखेके चाहीं। ओही शब्दन के अनुवाद कइल ठीक होई, जेकरा हमरा संस्कृति में रच-बस जाए के गुंजाइश होखे।
नोटबंदी

      नोटबंदी का एलाने के दिन से हम देखतानी कि सोशल साइट पर कवनो ना कवनो विधा में कला का नितनवीन रूप के दर्शन खूब हो रहल बा। लोग परेशानो बाड़े आ चुहलो करे से बाज नइखन आवत। पहिल बार बुझाइल कि साहित्य, संगीत आ कला नीयन इमानदारियो के सृजन-कार्य (स्वाभाविक का अलावे) बरियारी होखेला। जहाँ लोगन का दिमाग में ईमानदारी डरे ढुके लागल बिया ओहिजे संचार आ जनसंचारो के माध्यम साहित्य, संगीत आ कला का सरोवर में जमिके नहान करे में जुटि गइल बाड़न। नीति आ अनीति पर शास्त्रार्थ जमिके चल रहल बा। भाई, हमरा त तुलसी बाबा याद आवतारे- “को बड़ छोट कहत अपराधू।“ जय हमार प्रिय भारतवासी !

नीक-जबून- 2

(डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी)

1. जरूरी बा भोजपुरी के स्वाभिमान से जोड़ल
      ओइसे त बहुत पहिले से संविधान का आठवी अनुसूची में भोजपुरी के डलवावे के माङ भोजपुरिया करत बाड़न बाकिर एने दु-एक बरिस से त जइसे बाढ़ि आ गइल बा। बहुत लोग एकर श्रेय लिहल चाहता। साइत एही कारन सोशलो साइट पर कई गो दल जागरन ना त धरना अभियान जारी रखले बाड़न। हम सभके लाइक क दिहींले, काहेंकि एमें फायदा ढेर लउकेला। नयो पीढ़ी अब कूदे लागल बिया एमें। बड़-बड़ शहरो में अब लइका लजात नइखन सऽ झंडा उठावे में। जय भोजपुरी। एकरे त जरूरत बा आजु।
      साँच पूछीं त हम तरसि जाईंले कई बेरि भोजपुरी बोले खातिर। अहिंदी प्रदेश में बड़ा हिचकेले लोग भोजपुरी बोले में। भोजपुरी बोलत-बोलत हिंदी बोले लागेला लोग आ ना त कबो-कबो साँय-साँय बोले लागेलन। साइत डेराला लोग कि केहू गँवार जनि कहि देउ। बाकिर हमरा त एकरो से बरियार कारन बुझाला भोजपुरिया लोगन के परम उदारता आ अपना के महान लोगन का लिस्ट में जोड़वावे के सनक। दोसरा के चीज के नीमन आ अपना चीज के बाउर बतवला से आदिमी निष्पक्ष हो जाला नू ! असली बात त ई बा कि उदारता आ मूर्खता में ढेर अंतर ना होखे, खाली चेतना का कमी भा होखला से रूप बदल जाला। आपन पहिचान बदले के कोशिश से हीन ग्रंथि ना घटी भाई। अपना पहिचान के सुघर, उपयोगी, बेहतर ,कम से कम राष्ट्रीय आ ना त अंतर्राष्ट्रीय बनवला से घटी। हम त आजु ले ना लजइलीं लिखे-बोले में। भोजपुरी लिखे-बोले में काहें केहू लजाई भला ?
      भोजपुरी के लिखित रूप के पढ़ल सभका खातिर आसान नइखे, ई सोरहो आना सच बा। बाकिर एकर कारन का बा ? हमार जवाब बा- अभ्यास के कमी। सभसे कठिन हटे चीनी भाषा के लिपि। जब चीनी लोग ओकरा आगा केहूके ना पूछसु आ केनियो से कमी नइखे आइल ऊहन लो का गुणवत्ता आ जुझारूपन में त हमनी के थथमा काहें लागल बा ? साँच त ई बा कि हमनी का अब मेहनत से भागे लागल बानी जा आ एह स्थिति के कबहूँ सुखद भा शुभ ना कहल जा सके। अपने पढ़ीं आ घर-परिवार में सभके पढ़े के माहौल बनाईं। सवाल खाली भषे के नइखे, संस्कृतियो के बा। रउरा आपन भाषा बचाईं, संस्कृति त घलुआ (डिफाल्ट) में जोगा जाई। एहसे जइसे होखे, जतना होखे, जुटीं सभे, मिलीं सभे। छाती उतान कइके भोजपुरी बोलीं जा, लिखीं जा, पढ़ीं जा पढ़ाईं जा। अब जरूरी हो गइल बा भोजपुरी के अपना स्वाभिमान से जोड़ल। सवाल दगला भा भूभुन फोरला से कुछ मिली ना। जहिया ई बात सभ भोजपुरिया के बुझा जाई, ओह दिन आठवीं अनुसूची के के पूछो, सूची-सूची में भोजपुरी छपा जाई।
2. दीया-दियरी के दिन बहुरल
      तीन-चार दिन पहिले कपड़ा-ओपड़ा कीने खातिर निकलल रहीं जा। प्लेटफॉर्म प चढ़ते जवन लउकल, ओसे त चका गइलीं हम। जहाँ एक दिन पहिलहूँ खोजला पर पिछला जनम के दिया-दियरी मिलेले आ ऊहो जइसन-तइसन, ओहिजा रेलवे स्टेशन पर कई गो दियरी, रूई के बाती आ माचिस एक साथ पैक कइके मिल रहल बा आ ऊहो जगह-जगह पर। धन्य बाड़े भारतीय, भावना में बहिहें त सभ पीछा आ वैचारिकता में त पुछहीं के नइखे, दुनिया लोहा मानेले। नीक लागल। आतंकवाद केहूके भावे ना। चीन का उल्टा चलला के ई नतीजा ह कि बाजार के रुख बदलि गइल। अब बाजारो के सोचेके परी कि “जनविरोधी आ राष्ट्रविरोधी काम कइलऽ कि गइलऽ।” अब ना चाहीं केहूके चाक-चीक, दिये-दियरी से हमनी के काम चलि जाई। चलीं, अनासे एगो बड़हन काम हो गइल। कोंहार अपना शिल्पकला के कोसत-कोसत छोड़ेके स्थिति में आ गइल रहले हा। जइसहीं दीया-दियरी के दिन बहुरल कि उनुकरो मन हरियरा गइल आ अब त चानिये चानी बा। साँच कहीं त बरियार आदिमी ना होखे. समय होखेला। समये घाव देला आ ऊहे भरबो करेला।
      दिवाली के परब नगिचाइल बा बाकिर मन में ऊ उत्साह नइखे। मन नइखे होत कि टीवी के समाचार देखल जाव। एगो डर समाइले रहता। सीमा पर भा कश्मीर से कवनो दुखदायी खबर जनि आओ। अइसना में जब केहूँ पाकिस्तानियन के तरफदारी करेला भा असहिष्णुता के बात करेला त हमरा नजर का सोझा जइसे सुग्रीव आ जाले। बड़ भाई दुश्मन के पिठियावत गुफा में ढुकि गइल आ साहेब दुआरी प एगो बरियार पत्थर ओठँघाके किष्किंधा लवटि अइले आउर निश्चिंत गद्दी पर बइठि गइले। आजु-काल्ह जेकरे के देखीं, शुरू हो जाता। स्वतंत्रता आ स्वच्छंदता के अंतर लोग भुलाए लागल बाड़े, कर्ट्सी-मैनर के त बाते छोड़ दीं। बढ़िया समय ना कहाई। तबो हर स्थिति में दिवाली धूमधाम से मनो- ईहे हम चाहबि। स्वदेशी से देश के भावना जुड़ रहल बा। देश अपना थाती के पहचाने आ याद करे लागल बा। ई शुभ बा। नीमन दिन अब दूर नइखे। हम त ईहे शुभकामना करबि कि जइसे दीया-दियरी के दिन बहुरल ओसहीं हर मनई के दिन बहुरो, समाज के समरसता भंग करेवाली प्रवृत्ति के विनाश होखो आ सभका मन में प्रेम, सम्मान आ सद्भाव के उजास होखो।
(साभार- भोजपुरिका)


नीक-जबून- 1

(डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी)

1. चलीं, भोजपुरिओ में नेवता लिखल जाव
      अब लागऽता कि भोजपुरिहा बुद्धिजीवी एह बात के माने लागल बाड़े कि भोजपुरिहा अपना भाषा का प्रति काफी संकोची होले। एह संकोच का पीछे कवनो विधेयात्मक सोच कम, हीन बोध ज्यादा बा। जो केहू जान जाई कि ई भोजपुरी बोलेले त मानि ली कि अनपढ़ हवे। कारन चाहे जवने होखे बाकिर साँच त इहे बा। बाहर भीतर निकले-पइसेवाला आदमी त रोजे ई देख रहल बा। गैरभोजपुरी खास कर गैरहिंदीभाषी क्षेत्र में एकर सच्चाई नीमन से लउकेले।
      कुछ दिन पहिले आरा गइल रहीं। एगो रिक्शा प बइठले एक आदमी के इंतजार करत रहीं। रिक्शावाला कवनो शब्द के सही वर्तनी पुछलसि। हम ओकरा के दू गो वर्तनी बतवलीं एगो हिंदी आ एगो भोजपुरी खातिर। ऊ हिंदी वर्तनी पर त मूड़ी हिला लिहलसि बाकिर भोजपुरीवाली बात पर अचंभा में परि गइल। “भोजपुरियो में लिखाला का ?” एगो अजीब मुद्रा में हमरा ओरि ताकिके ऊ पुछलसि।
      ई प्रश्न भोजपुरी भाषा आ साहित्य के प्रचार-प्रसार के पोल खोले खातिर काफी बा। खाली कुछ लघु पत्रिका निकालि लिहला आ नेट पर पढ़ि-लिखि लिहला से भोजपुरी मानसिकता में अपेक्षित बदलाव संभव नइखे। एकरा खातिर सामाजिक संस्थानन के विशेष जागरूकता अभियान चलावे के परी। हमनी के अपना हर आमंत्रण पत्र, पोस्टर आदि में हिंदी का सङही भोजपुरियो में लिखे शुरू करेके परी। पहिले लोगन के ई त लागो कि भोजपुरी में लिखला में गँवारूपन नइखे, अपना भाषा का प्रति प्यार आ सम्मान बा। ई पहल पहिले हर जागरूक बनाम बुद्धिजीवी भोजपुरिहा के करेके परी। फेरु जब धीरे-धीरे ई फइल जाई त कवनो भाषण के जरूरत ना परी।
      अपना सभ भोजपुरिहा भाई बहिन लोग से हम ई निहोरा कइल चाहबि कि अपना हर आमंत्रण पत्र, पोस्टर आदि में भोजपुरी के भी इस्तेमाल करीं। तबे अपना संस्कृति के कुछ जरूरी थातिन के बचावल जा सकऽता आ अपना माटी के भाषा के गर्व के भाषा बनावल जा सकऽता। चलीं, भोजपुरिओ में नेवता लिखल जाव।
2. एक बार निहोरा कऽके देखल जाउ
      काल्हु हमार एगो मित्र पांडेय जी आइल रहीं। उहाँ का केंद्र सरकार के एगो जिम्मेवार कर्मचारी हईं, अत्यंत सज्जन पुरुष, संस्कार से भरपूर। मिलींले त अपना संस्कृति आ गाँव-घर पर खूब बात होखेला, खुल के। उहाँ के दू गो लइका केंद्रे सरकार में नोकरी में बाड़े सन आ उहनी के बियाह के बातचीत चल रहल बा। हम अपना ब्लॉग के चर्चा कइलीं आ उहाँके देखवलीं भी। उहाँ का बहुत उत्साहित भइलीं। हम अनुरोध कइलीं कि “तब नेवताऽऽ...” उहाँका हमार मन बूझि लिहलीं आ बिना थथमले बोललीं- “एकदम भोजपुरिए में। गाँव से बियाह होई त खाली भोजपुरी में आ कलकत्ता से होई त हिंदियो में।” हमार मन भीतर से खिल गइल। शुरुआत त नीमन भइल। रउँवा सभ तक ई समाचार जल्दिए पहुँचावल चाहत रहलीं हा। हमरा त बुझाता कि कहले के देरी बा , केहू नाहीं ना करी। एह से आपन झूठमूठ के संकोच छोड़ल जाउ आ अपना हित-मीत, दर-देयाद सभ से एक बार निहोरा कऽके देखल जाउ। ज्यादा उमेदि बा सफलते मिली।   
3. विजयदशमी कि विजयादशमी ?
      आजु विजयादशमी ह आ हमार प्रिय मित्र डॉ. विजय प्रकाश एह घरी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहल बाड़े। मन भरल रहल हा बाकिर एगो पुरान डायरी पलटत खा उनकर कुछ एसएमएस मिलल बा। मन फेरु चुलबुल हो उठल। फेरु ऊहे मिजाज, ऊहे अंदाज। 02.10.2006 के ऊ लिखलन -
            विजय सत्य की हो असत्य पर / संबंधों का रंग हो गहरा
            प्रेम पुलक से भरा समुज्ज्वल / मंगलमय हो विमल दशहरा।
हम अपना आदतबश भोजपुरी में लिखलीं-
            दारिद दशानन पर विजय दशहरा ह / गमगम उमंग भरल जीवन दशहरा ह
            रच जाए बस जाए मन में दशहरा / सजके सँवर जाए तन में दशहरा।
पन्ना पीछे पलटलीं त 23.9.2006 के कुछ अउर एसएमएस मिलल। मन फेरु चुलबुल हो उठल। फेरु ऊहे मिजाज, ऊहे अंदाज।
विजय-       तीन दिनों से बारिश बारिश / मन अब ऊब चला है
            चलो चलें मन मित्रों के घर / दस्तक देकर देखें।
विमल-       मन एतना उबियाइल बा / अपना दुखबारी से
            कवनो सुख के बात लगेला / मीत उधारी से।
            बारिस आई बारिस आई / मन के काई कइसे जाई
            पाती तहरो पवलीं त / लागल पहिला दिन फिर आई।
साँचो दुर्गापूजा में हइसे बरखा होला ? चारू ओरि पानी-पानी आ काँच-कीच। तूफान के नाँव से सभकर साँस टङाइल बा- से अलग। मन लवटल। आजु विजयादशमी ह। बिल्कुल पोजीटिव थिंकिंग, हार के कवनो चर्चे ना। जइसे फगुआ में बैर आ नफरत भुलाके सभ राग रंग में डूबि जाला, ओसहीं आजु हारशब्द के त मन में आवही ना देबे के चाहीं।
            आजु खाली जीत आ विजयी रहे के बात होखे
            हार भय संशय कहीं से आ न पावे पास मन के।
आरे भाई, ई त कविता हो गइल। माने के परी अपना पूर्वज लो के। अतना सोचि-समझिके काम करत रहे लोग। आजु-काल्हु पच्छिम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मातृ दिवस, पितृ दिवस, महिला दिवस आदि आदि मनावे के काम जोर-जोर से चल रहल बा बाकिर हमनी किहाँ त हजारन बरिस पहिले से तीज, जिउतिया के बरत धूमधाम आ सावधानी से मनावल जाला आ छठ के परब त अब डिठारे हो गइल बा। हमरा संस्कृति में हर काम खातिर बैनर के जरूरत नइखे बूझल गइल।

      कुछ दिन पहिले कोलकाता के एगो प्रसिद्ध अखबार के विशेषांक के मुखपृष्ठ पर बड़-बड़ टह-टह लाल अक्षरन में विजयदशमी पढलीं। मन अचकचाइल। बहुत दिन बाद कवनो बुद्धिजीवी कड़ा इस्टेप उठवले बा अपना पूर्वजन पर। आखिर गलत चीज के कब तक झेलत रही आदमी आ ऊहो मीडिया से जुड़ल आदमी। ताकत आ प्रभुत्व के खुशबू से गमगमात मन शांत कइसे बइठी ? एक मन कहलसि कि प्रूफ के गलती होई। दोसरका मन कहलसि कि देखत रहिह, एक दिन एकादशका जगहा एकदशलिखल पढेके मिली। त हम का करीं ? मए गिनती आ पहाड़ा ठीक करे के हमरा के प्रभारी बनावल गइल बा ? अबकी पहिलका मन समुझवलसि- भाई परेशान भइला के जरूरत नइखे। हमनी किहाँ पाणिनी आ पतंजली गली-गली में भेंटा जइहें। विश्वामित्रका जगहा विश्वमित्रपढेके कबो नइखे मिलल का ?

Saturday, December 26, 2015

Sunday, March 8, 2015

चलीं, फगुआ गावल जाव



डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल 


       फगुआ कहीं, होरी कहीं भा होली कहीं, हटे एकही। ई बसंतोत्सव हउवे। बसंत जब चढ़ जाला त उतरेला कहाँ ?  एहीसे त होली के रंगोत्सव के रूप में मनावल जाला प्रकृतियो हमनी के साथ देले। नु ठंढा नु गर्मी, का मनभावन मौसम होला! रंगन के महफिल में शिष्टता आउर सौहार्द्र के सुगंध होला आ पारंपरिक मर्यादा में उत्साह के विकास होला। ई ऊ पर्व हऽ जवना में अवस्था बोध व्यक्ति आ समाज- दूनो का संदर्भ में क्रियाहीन हो जाला आ व्यक्ति में ओकरा ऊर्जा का हिसाब से उछाह लउकेला। एही से त कहल गइल बा- फागुन में बुढ़वो देवर लागे।’

                होली में शृंगार के पराकाष्ठा भी लउकेला, खासकरके कबीरा आ जोगीरा के रूप में बाकिर तबहुँओ ओकरा कथन भंगिमा भा गायन शैली में उत्तेजना खातिर कवनो जगह ना होखे आ नाहीं काम(SEX)  के विकृत रूप के सम्माने मिलेला। लोक साहित्य आ संगीत में अपना एह सीमा में रति भाव ओइसहीं स्वीकार कइल गइल बा जइसे बियाह ओगैरह मांगलिक अवसरन पर मेहरारू लोगन के गाली के गवाई।

होलिका दहन, अबटन आ झीली

                फगुआ से एक दिन पहिले होलिका जरावल जाले जवना के सम्मत जरावल’ कहल जाला। जब लोग अपना मोहल्ला से होलिका दहन खातिर डंटा में होलरि बान्हि के निकलेलन त जयकारा का मुद्रा में होलरि!होलरि! कहत चलेलन। ई आवाज सुनते लोग अपना-अपना घर से तेयार होके तुरत निकल जालन। होलिका दहन का दिने घर का हर सदस्य के हरदी आ तेलहन का लेप माने अबटन से पूरा शरीर के मालिश होला आ जवन मइल छूटेले, ओकरा के झीली’ कहल जाला। ऊ झिलियो होलिका दहन में जरा दिहल जाले। त्वचा का सतह पर के साधारन रोगन के अतना कम समय में व्यक्ति स्तर से लेके सामाजिक स्तर तक पर मिटा देबे के एह से नीमन जोजना का केहू बना सकता ? एकरा के शारीरिक स्वास्थ्य का विज्ञान का नजरिया से भी देखल जा सकता।
रंग-अबीर आ गुलाल का सङे होली के हुड़दंग

       रंग बरसे भींजे चुनरवाली’ जइसन होरी गीतन का पाछा जवन विज्ञान बा ओकरा के मन से जोड़के देखल जा सकता। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ मतलब कवनो जीत में मन के भूमिका जबर्दश्त बा। जीवन में जब रंगन के समावेश होखे तबे ओकर मजा बा, नाहीं त जिनिगी गदहा के लादी हो जाई। रंग प्रेरणा के काम करेला, रंग उत्साह भरेला, रंग उद्दीपन त होइबे करेला, कबो-कबो अपना जबर्दश्त आकर्षण का कारन आलंबन भी बनि जाला। जिनिगी से रंग निकलि जाई त जिनिगी बेरंग हो जाई। बदरंग त खराब होइबे करेला बाकिर बेरंग ओकरो ले आले हो जाला, बेमाने के जिनिगी। अपना हित-अनहित के सोचिके जो रंग खेलल जाई त रंगोत्सव सुख आ आनंद के बरखा करी- एह में कवनो संदेह नइखे। होली के हुड़दंग माने जहाँ गारी आ गीत के अनुपात बराबर होखे। ई सबेरे से शुरु होई त दुपहरिया तक चलत रही रसदार रंग का साथ। फेरु नहा-धो के साँझि खा अबीर-गुलाल लगावे के काम शुरु होई। पहिले देवी देवता के चढ़ावल जाला आ फेरु बड़-बुजुर्ग का चरन पर आ समउरिया आदि के रूप रंग का साथे खेलवाड़ शुरू हो जाला। एह दिन घर-घर में विशेष पकवान बनेला - पुआ, पूड़ी, गोझिया आदि।

फगुआ

                होली का अवसर पर जवन गीत गवाला ओकरे के फगुआ कहल जाला। एकर शुरुआत माघ बसंत पंचमी से मानल जाला। ओही दिन ताल ठोकाला आ तब से भर फागुन गवात रहेला। एकर चरम उत्कर्ष फागुन के पुरनवासी आ चइत के अन्हरिया परिवा के लउकेला। चाहे लइका होखे भा जवान भा बूढ़, होली में सभ मस्तिए में लउकेला।

                होली गायन के शुरुआत भगवान शंकर भा कृष्ण के रस, रंग आ संगीत में डूबल भजन से होखेले ईहे हमनी के परंपरा ह आ एही चलन में हमनी के मस्ती परवान चढ़े लागेले। चौपाल सजे लागेला, डंफ आउर ढोल के थाप के सङही झाल आ झाँझ के झनकार बाताबरन के एगो खास किस्म के मोहक रूप देबे लागेले।

                बाकिर,  आजु मौसम बदल गइल बा। चौपालन पर से सामूहिक गायन के अधिकार टूटे लागल बा। म्यूजिक कंपनी आ नया-नया आडियो-वीडियो माध्यम होली के एह सांस्कृतिक रंग में सेंध लगा देले बाड़न स। खुलापन के नाम पर एगो कल्पित कुरूप शृंगार हाबी होखे लागल बाद्य मजबूरी के आलम ई बा कि शिष्ट आ सभ्य लोगन के आपन कानो बंद करेके परेला। ऊ लोग अइसन आयोजनन से दूर हो रहल बाड़न बाकिर नया पीढ़ी के त मजा आ रहल बा आउर बिना कवनो परिनाम के चिंता कइले ओकर कदम थिरकत लउकता।

      साँच पूछीं त ई हमनी के संस्कृति खातिर एगो त्रासद घड़ी बा। एहमें फगुआ के चेहरा दिन प दिन बदरंग होखत जाता। वर्तमान लोकगायन के कहीं से नु बड़ाई कइल जा सकता नु समर्थन। आपन बजार चमकावे खातिर अधिकतर गायक बाजारू हो गइल बाड़े आ उनुका खातिर कवनो पारंपरिक भा मानवीय मूल्य माने नइखे राखत। अब समय आ गइल बा कि भोजपुरी गायक, गीतकार आ म्यूजिक कंपनी- सभके एहू पहलू पर गंभीर होखेके परी आउर संस्कृतियो के भविष्य के कुछ चिंता करहीं के परी काहेंकि एही संस्कृति से इहाँ सभ के रोजी-रोटी चलेले।

                संसार के समस्त संस्कृतियन नियन भोजपुरी अंचल के संस्कृति के ईहो थाती वैश्वीकरण के भेंट चढ़ि रहल बिया। पता ना घालमेल के फैशन हमनी के कतना फायदा पहुँचाई, बाकिर अतना बिश्वास जरूर बा कि भोजपुरिहा एह त्रासद घरी में भी आपन रक्षा करे में केहूँ के मुँह ना जोहिहें आ ना मुँह के खइहें।


(साभार- भोजपुरिका डॉट कॉम)
‘चलीं, फगुआ गावल जाव’ भोजपुरिका डॉट कॉम पर देखीं-