Thursday, January 19, 2017

नीक-जबून- 2

(डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी)

1. जरूरी बा भोजपुरी के स्वाभिमान से जोड़ल
      ओइसे त बहुत पहिले से संविधान का आठवी अनुसूची में भोजपुरी के डलवावे के माङ भोजपुरिया करत बाड़न बाकिर एने दु-एक बरिस से त जइसे बाढ़ि आ गइल बा। बहुत लोग एकर श्रेय लिहल चाहता। साइत एही कारन सोशलो साइट पर कई गो दल जागरन ना त धरना अभियान जारी रखले बाड़न। हम सभके लाइक क दिहींले, काहेंकि एमें फायदा ढेर लउकेला। नयो पीढ़ी अब कूदे लागल बिया एमें। बड़-बड़ शहरो में अब लइका लजात नइखन सऽ झंडा उठावे में। जय भोजपुरी। एकरे त जरूरत बा आजु।
      साँच पूछीं त हम तरसि जाईंले कई बेरि भोजपुरी बोले खातिर। अहिंदी प्रदेश में बड़ा हिचकेले लोग भोजपुरी बोले में। भोजपुरी बोलत-बोलत हिंदी बोले लागेला लोग आ ना त कबो-कबो साँय-साँय बोले लागेलन। साइत डेराला लोग कि केहू गँवार जनि कहि देउ। बाकिर हमरा त एकरो से बरियार कारन बुझाला भोजपुरिया लोगन के परम उदारता आ अपना के महान लोगन का लिस्ट में जोड़वावे के सनक। दोसरा के चीज के नीमन आ अपना चीज के बाउर बतवला से आदिमी निष्पक्ष हो जाला नू ! असली बात त ई बा कि उदारता आ मूर्खता में ढेर अंतर ना होखे, खाली चेतना का कमी भा होखला से रूप बदल जाला। आपन पहिचान बदले के कोशिश से हीन ग्रंथि ना घटी भाई। अपना पहिचान के सुघर, उपयोगी, बेहतर ,कम से कम राष्ट्रीय आ ना त अंतर्राष्ट्रीय बनवला से घटी। हम त आजु ले ना लजइलीं लिखे-बोले में। भोजपुरी लिखे-बोले में काहें केहू लजाई भला ?
      भोजपुरी के लिखित रूप के पढ़ल सभका खातिर आसान नइखे, ई सोरहो आना सच बा। बाकिर एकर कारन का बा ? हमार जवाब बा- अभ्यास के कमी। सभसे कठिन हटे चीनी भाषा के लिपि। जब चीनी लोग ओकरा आगा केहूके ना पूछसु आ केनियो से कमी नइखे आइल ऊहन लो का गुणवत्ता आ जुझारूपन में त हमनी के थथमा काहें लागल बा ? साँच त ई बा कि हमनी का अब मेहनत से भागे लागल बानी जा आ एह स्थिति के कबहूँ सुखद भा शुभ ना कहल जा सके। अपने पढ़ीं आ घर-परिवार में सभके पढ़े के माहौल बनाईं। सवाल खाली भषे के नइखे, संस्कृतियो के बा। रउरा आपन भाषा बचाईं, संस्कृति त घलुआ (डिफाल्ट) में जोगा जाई। एहसे जइसे होखे, जतना होखे, जुटीं सभे, मिलीं सभे। छाती उतान कइके भोजपुरी बोलीं जा, लिखीं जा, पढ़ीं जा पढ़ाईं जा। अब जरूरी हो गइल बा भोजपुरी के अपना स्वाभिमान से जोड़ल। सवाल दगला भा भूभुन फोरला से कुछ मिली ना। जहिया ई बात सभ भोजपुरिया के बुझा जाई, ओह दिन आठवीं अनुसूची के के पूछो, सूची-सूची में भोजपुरी छपा जाई।
2. दीया-दियरी के दिन बहुरल
      तीन-चार दिन पहिले कपड़ा-ओपड़ा कीने खातिर निकलल रहीं जा। प्लेटफॉर्म प चढ़ते जवन लउकल, ओसे त चका गइलीं हम। जहाँ एक दिन पहिलहूँ खोजला पर पिछला जनम के दिया-दियरी मिलेले आ ऊहो जइसन-तइसन, ओहिजा रेलवे स्टेशन पर कई गो दियरी, रूई के बाती आ माचिस एक साथ पैक कइके मिल रहल बा आ ऊहो जगह-जगह पर। धन्य बाड़े भारतीय, भावना में बहिहें त सभ पीछा आ वैचारिकता में त पुछहीं के नइखे, दुनिया लोहा मानेले। नीक लागल। आतंकवाद केहूके भावे ना। चीन का उल्टा चलला के ई नतीजा ह कि बाजार के रुख बदलि गइल। अब बाजारो के सोचेके परी कि “जनविरोधी आ राष्ट्रविरोधी काम कइलऽ कि गइलऽ।” अब ना चाहीं केहूके चाक-चीक, दिये-दियरी से हमनी के काम चलि जाई। चलीं, अनासे एगो बड़हन काम हो गइल। कोंहार अपना शिल्पकला के कोसत-कोसत छोड़ेके स्थिति में आ गइल रहले हा। जइसहीं दीया-दियरी के दिन बहुरल कि उनुकरो मन हरियरा गइल आ अब त चानिये चानी बा। साँच कहीं त बरियार आदिमी ना होखे. समय होखेला। समये घाव देला आ ऊहे भरबो करेला।
      दिवाली के परब नगिचाइल बा बाकिर मन में ऊ उत्साह नइखे। मन नइखे होत कि टीवी के समाचार देखल जाव। एगो डर समाइले रहता। सीमा पर भा कश्मीर से कवनो दुखदायी खबर जनि आओ। अइसना में जब केहूँ पाकिस्तानियन के तरफदारी करेला भा असहिष्णुता के बात करेला त हमरा नजर का सोझा जइसे सुग्रीव आ जाले। बड़ भाई दुश्मन के पिठियावत गुफा में ढुकि गइल आ साहेब दुआरी प एगो बरियार पत्थर ओठँघाके किष्किंधा लवटि अइले आउर निश्चिंत गद्दी पर बइठि गइले। आजु-काल्ह जेकरे के देखीं, शुरू हो जाता। स्वतंत्रता आ स्वच्छंदता के अंतर लोग भुलाए लागल बाड़े, कर्ट्सी-मैनर के त बाते छोड़ दीं। बढ़िया समय ना कहाई। तबो हर स्थिति में दिवाली धूमधाम से मनो- ईहे हम चाहबि। स्वदेशी से देश के भावना जुड़ रहल बा। देश अपना थाती के पहचाने आ याद करे लागल बा। ई शुभ बा। नीमन दिन अब दूर नइखे। हम त ईहे शुभकामना करबि कि जइसे दीया-दियरी के दिन बहुरल ओसहीं हर मनई के दिन बहुरो, समाज के समरसता भंग करेवाली प्रवृत्ति के विनाश होखो आ सभका मन में प्रेम, सम्मान आ सद्भाव के उजास होखो।
(साभार- भोजपुरिका)


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