Thursday, August 14, 2014

बिहान अब होई



कविता

मीत,
का लिखीं पाती में
ईहे सोचे में कतना दिन असहीं गुजर गईल
एहिजा नया समाचार बड़ले का बा.
रोज त बस एके तरह के घटना
कहीं दस के हत्या कहीं पांच के बलात्कार
दहेज के लोभी बहू के जरा दिहले सऽ
त कहीं पटरी पर से रेल उतरलि
कहीं घर गांव फुंका गईल
कवनो अधिकारी सीबीआई के चपेट में
केनियो बाढ़ से गाँव के गाँव दहा गईल
त सुखार से धरती जरि गइली केनियो.
लोग बाग डहकऽता
रोज ईहे कुल पढ़त सुनत
संवेदना मर गइल बा हमनी के
अब त जइसे परभावे ना रहल एकर.

हँ, इयाद आइल
हर चेहरा प एगो नया तेज देख रहल बानी कुछ दिन से
सभके मन में कुछ सुगबुगा रहल बा
फर्ज आ अधिकार के बात सुन रहल बानी
हर गली हर कूचा हर गाँव हर शहर
दोसरा के बुद्धि पर जीएवाला लोगो
इस्तेमाल करे लागल बाड़े आपन दिलो दिमाग
लागऽता अन्हरिया के दिन अब खतमे बा
बिहान अब होइबे करी.

एही आस में त
जइसे हमनी सभ के हँसल गावल थथमल बा
देखीं गीत कहिया फूटेला
गजल कब ले गवाले
ढोलक के डोरी कब खिंचातिया
पखाउज कब मढ़ाता !
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साभार-अँजोरिया डॉट कॉम
बिहान अब होई 

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