Friday, August 15, 2014

'फगुआ के पहरा' पर एक नजर




- मनोकामना सिंह अजय


आदरणीय डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल जी,
सादर प्रणाम.

अपने के भेजल फगुआ के पहरासावन में भाई गंगा प्रसाद अरुण के मार्फत मिलल. राउर गजल के ई लाइन हमनी पर बिलकुल ठीक बइठत बा -

फागुन कहाँ गइल ना कुछऊ लगल पता

सावन बा हमरा आँख में आके समा गइल.

फगुआ के पहरामें राउर लिखल गीत सभ रसगर, मजगर आ दमगर बा. एह में छपल सभ गजल में शहर आ देहात के गमक बा. साँच कहीं त आँखि लागि गइलकविता सबसे नीक लागल. राउर अनुभवके विस्तार लोगन के एगो नया अनुभव दीही.

आजु बहुते गिरल जा रहल आदमी

हर गिरल जिंदगी के उठावल करीं.

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कल तक पियावल जे अँजुरी से अमिरित

ओकरे अँजुरिया जहर से भरल बा.

आज हमनी के जिनिगी के साँच के दरसा रहल बा.

आज के जरूरी के राउर लिखल ई लाइन गौर करे लायक बा -

आईं हमनी सभ बइठीं सुख दुख आपन बतियाईं जा

घरफोरवा बा के हमनी के ओकर पता लगाईं जा

मान बढ़ाईं जा माटी के भेदभाव सभ छोड़ि के.

फगुआशब्द त शहर का, गाँवो-जवार से धीरे-धीरे खतम हो जाई. हमनी का जब लड़िका रहीं जा त फगुआ के दू चार दिन पहिलेहीं से धूर-माटी अपना संघी-संघतियन पर उड़ावत मजा लेत रहीं जा. फगुआ के दिन त धूर माटी के के कहो पाँक में लभराइल बोथाइल हमनी का घरे-घरे घुमत रहीं जा. अब ऊ दिन कहाँ देखेके मिली. अब त पानी बचावे के नाँव पर टीका होली खेलल जा रहल बा.

रउरा जब भोजपुरी माध्यम से लिखला पर भौंह, भृकुटी का सङही मिजाज बदले के बात लिखत बानी त ओकरा संगही इहो ख्याल राखे के चाहत रहे कि भोजपुरी मेंही’, ‘भीके प्रयोग अच्छा ना मानल जाला. एह पुस्तक में अनावश्यक रूप से कुछ हिन्दी आ अँग्रेजी के शब्दन के प्रयोग कइल गइल बा जेकरा से बँचल जा सकत रहे. कुल मिलाके गाँव के माटी से राउर जुड़ाव प्रशंसा करे के योग्य बा.

- मनोकामना सिंह अजय



कृष्णा भवन,

२७, विवेक नगर, छोटा गोविंदपुर,

जमशेदपुर ८३१०१५




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साभार- भोजपुरिका डॉट कॉम


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